सदियों से भारत में शरद पूर्णिमा का महोत्सव मनाया जाता है । धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन चन्द्रमा से अमृत वर्षा होती है , और इसी दिन कृष्ण ने महारासलीला रचाई थी । अत: मध्य रात्री के समय मेवा मिष्ठान युक्त दूध या खीर चॉदनी में खुली रखकर चन्द्रमा की आराधना के पश्चात सब लोग सेवन करते हैं । कहते हैं कि अस्थमा के रोग से मुक्ति मिलती है . इन दावों की सच्चाई क्या है , क्या सच में अमृत वर्षा होती है ? यह प्रश्न विज्ञान की कसौटी पर अभी तक आधारहीन माना जाता रहा है ।

धार्मिक आस्था के अनुसार कथन है कि –
– “ आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक के मध्य जब भगवान विष्णु शयन मुद्रा में होते हैं तो पृथ्वी पर भुखमरी, दरिद्रता व सूखे की देवी ‘अलक्ष्मी’ का साम्राज्य रहता है ।इन्हीं के साथ प्रलय के अन्य तीन देवता, ज्वर-बुखार जन्य रोंगों के स्वामी रूद्र, भूस्खलन बाढ़ और सूखे के स्वामी वरुण तथा अनेक रोंगों, दुर्घटनाओं एवं अकाल मृत्यु के स्वामी ,यम का पृथ्वी पर तांडव होता रहता है। इस अवधि में “देवप्राण “ कमजोर पड़ जाते हैं और आसुरी शक्तियों का वर्चश्व बढ़ जाता है ।परिणाम स्वरुप पृथ्वी पर अधिक पाप बढ़ जाते हैं।

– शक्ति आराधना का पर्व नवरात्रि के नवें दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना करके जब दशमी तिथि को व्रत पारण होती है,तो अगले ही दिन विष्णुप्रिया ‘पापांकुशा’ एकादशी के दिन मां लक्ष्मी पापों पर अंकुश लगाना आरम्भ देती हैं।

– पूर्णिमा के ही दिन जब भगवान कृष्ण अपनी नौ लाख गोपिकाओं के साथ स्वयं के ही नौलाख अलग-अलग गोपों के रूप में ‘महारास ‘ कर रहे होते हैं , तो मां महालक्ष्मी , पृथ्वी पर घर-घर जाकर सबको दुःख दारिद्रय से मुक्ति का वरदान देती हैं । पर जिस घर के सभी प्राणी सो रहे होते हैं , वहां से ‘लक्ष्मी’ दरवाजे से ही वापस चली जाती है। तभी शास्त्रों में इस पूर्णिमा को ‘कोजागरव्रत’ यानी कौन जाग रहा है व्रत भी कहते हैं। इसदिन रात्रि में की गई लक्ष्मी पूजा सभी कर्जों से मुक्ति दिलाती हैं। अतः शास्त्र इस शरदपूर्णिमा को ‘कर्जमुक्ति’ पूर्णिमा भी कहते हैं।

– धर्म के सचेतक पंडितों ने इस अवसर का लाभ उठाकर रात्रि में मां लक्ष्मी की षोडशोपचार विधि से पूजा करना , ‘श्रीसूक्त’ का पाठ कराना , ‘कनकधारा स्तोत्र’, विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ अथवा भगवान् कृष्ण का ‘मधुराष्टकं’ का पाठ के साथ ब्राह्मणों को दान आदि ईष्टकार्य कराकर सिद्धि प्राप्ति का सरल तरीका बताया गया है । चन्द्रमा की पूजा में मिष्ठान, मेवे और खीर का भोग लगा कर , अर्ध रात्रि में ही बड़े पात्र में खीर बनाकर खुले आसमान में अथवा छत पर रखकर सामुहिक प्रसाद ग्रहण किया जाता है ।”

धार्मिक मान्यताओं का सामाजिक जीवन में अपना महत्व है ।धर्म के ठेकेदार पंडित साधु बाबा लोगों की मान्यताओं का विवेचन करके उनकी सामयिकता और सचाई की खोज करने का प्रयास करना एक जौखिम भरा काम है ।इस पचड़े से हर विवेकशील व्यक्ति को दूर रहने में ही उसका हित है ।पर जिस तरह से इन्टरनेट पर अगर आप फिल्टर लगा दें या ‘फायर वाल ‘ का एप डाल दें ,तो ढ़ेर सारी “स्पाम” और ‘पोर्न ‘ की जानकारी , फिल्टर होकर , महत्वपूर्ण काम की जानकारी मिल जाती है । उसी प्रकार यदि हम इन धार्मिक आस्थाओं और मान्यताओं का “हेअरलाईन”विश्लेषण करें , तथा असंगत तथ्यों को अलग करके देखें तो , हमें किसी न किसी स्तर पर विज्ञान के मूल आधारभूत सिव्दान्त का परिपालन नजर आने लगता है ।वशर्ते हम इन कपोल कल्पित आड़म्बरों को छान कर देखने की क्षमता विकसित करलें ।

Posted by Ram Shrivastava on Saturday, October 12, 2019

ऐसी ही वैज्ञानिक परिकल्पना हमको “ शरद-पूर्णिमा “ महोत्सव के मूल तत्वों में छुपी हुई मिल जावेगी ।दरअसल में सूर्य पृथ्वी और चन्द्रमा शरद पूर्णिमा के दिन एक लकीर में आ जाते हैं ।चन्द्रमा पृथ्वी की दूरी भी कम होती है । सूर्य पर नाभकीय विस्फोटों के कारण सौर लपटों से विकीरण का तूफान उठकर धरती की ओर लपकता है । पृथ्वी के चारों तरफ चुम्बकीय बल रेखाओं का एक आवरण लिपटा रहता है ।यही चुम्बकीय आवरण हमारे जीवन का कारण है । सूर्य के नाभकीय संगलन से निकली घातक और जहरीले विकीरण में मौजूद ‘आवेशित कणों ‘ को यह चुम्बकीय आवरण धकेल कर दूर कर देता है ।

जिस तरह किसी महिला के लम्बे काले केशों को खोलकर तेज हबा फैंकने वाले पंखे के सामने बैठा दिया जाय तो, युवती के बाल तेज हबा के कारण पंखे की हबा के गमन की दिशा में लहराने लगेंगे । ठीक इसी तरह सूरज से आने वाले “सौर बवन्डर “ की धपन से धरती की चुम्बकीय बल रेखाएं , धरती की रात वाली दिशा की ओर तेजी से उड़कर शरद पूर्णिमा की रात को सीधे चन्द्रमा की सतह पर जाकर टकराने लगती हैं । चन्द्रमा की बारीक धूल में जब यह “सौर धपन “ धरती की चुम्बकीय बल रेखाओं के सहारे सहारे तैर कर , चन्द्रमा पर गिरती हैं , तो चन्द्रमा की धूल को “विद्युत आवेश “ से चार्ज कर देती है । यह आवेश जब ज्यादा होजाता है , तब चन्द्रमा की सतह पर ‘शार्ट सर्किट ‘ जैसी हालत बनाकर चिन्गारियों फूटने लगती हैं । चन्द्रमा की महीन धूल के यह विद्युत आवेशित कण , चन्द्रमा के आसमान में कई मीटर ऊपर उछल जाते हैं , तथा कम गुरूत्वाकर्षण होने के कारण सतह पर ही तैरने लगते हैं ।

चन्द्रमा की धूल से लिपटे आवेश जिसमें इल्क्ट्रोन, प्रोटोन और बहतेरे नाभकीय कणों का विकीरण होता है ,बह पुन: धरती को चूम कर आ रही चुम्बकीय बल रेखाओं मे फस कर ,जिस तरह श्रीकृष्ण जी ने लाखों गोपियों के साथ अपने ‘काल्पनिक क्लोन ‘ बनाकर ,” महारासलील” का नृत्य किया था , ठीक उसी तरह चन्द्रमा की सतह से विस्फोटित कण , पृथ्वी से आ रही चुम्बकीयबल रेखाओं के चारों तरफ लिपटकर ‘ नृत्य ‘ यानि रासलीला करने लगती हैं ।

यह भी एक विचित्र समानता ही है कि कृष्ण की रासलीला में मधुर वांसुरी की धुन पर नृत्य ताल होता था ,उसी तरह “जब कोई चार्ज पार्टिकल मेगनेटिक फील्ड में फसकर डॉन्स करने लगता है तो उसमें “‘इलेक्ट्रोमेगनेटिक रेडियेशन ‘“ तारों तरफ निकलती हैं “ । अत: यह तो अपनी जगह वैज्ञानिक सत्य है कि शरद-पूर्णिमा की रात को आधी रात के समय जब सूर्य से निकली “सोलर विन्ड” धरती के वायुमण्डल का चुम्बन करके , पृथ्वी की चुम्बकीय बल रेखाओं के सहारे चन्द्रमा पर गिरेगी तो चन्द्रमा की सतह पर चिन्गारियॉ फूटने लगेगी । इनसे निश्चित ही “विद्युत-चुम्बकीय तरंगें” पैदा होती हैं । इन विद्युत-चुम्बकीय तरंगों की फ्रीक्वेन्सी मनुष्य के दिमाग में चलने वाली न्यूरॉन की तरंगों के समान ही होती है । यहीे एक कारण यह भी माना जा सकता है कि “पूर्णिमा” के समय जो लोग मानसिक बीमारियों से ग्रसित हैं उन्है “पागलपन” का दौरा तेजी से पड़ने लगता है ।

शरद पूर्णिमा के समय अमृत वर्षा हो या नहो , पर चन्द्रमा से आने वाले “ इलेक्ट्रो मेगनेटिक रेडिएसन “ में वृद्धि अवश्य होती है । ऐसा कहते हैं कि दूध में ‘लेक्टिक एसिड ‘ होता है और खीर के चावलों में ‘स्टार्च ‘ की मात्रा ज्यादा होती है जिससे चन्द्रमा की चॉदनी से टकराकर आने वाली किरणों के साथ जो अमृत वर्षा हो रही है वह अमृत खीर में ज्यादा घुल जाता है । इस मान्यता के भीतर कौन सा वैज्ञानिक तथ्य छुपा है , यह अभी अनबुझी पहेली ही है ।

वैज्ञानिक सत्य और धार्मिक मान्यता का “मोदी और झी जिनपिंग” गठबन्धन कितना सामयिक है यह तो समय बताएगा , पर आईये हम तो शरद पूर्णिमा की अमृत मिश्रित खीर का आनन्द उठाकर प्रकृति में हो रही चॉदनी रात की सुन्दरता की “महारासलीला” के लुफ्त का आनन्द बटोरें ।

-डा० राम श्रीवास्तव (drramshrivastava@gmail.com)

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