तेहरान: ईरान और अमेरिका के बीच हाल ही में हुआ शांति समझौता इस समय वैश्विक स्तर पर सुर्खियों में बना हुआ है। इस ऐतिहासिक पीस डील पर अब ईरान के सर्वोच्च नेता मुज्तबा खामेनेई की बड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है, जिसने सभी को हैरान कर दिया है। खामेनेई का दावा है कि इस समझौते के लिए ईरान से ज्यादा अमेरिका मजबूर और बेचैन था। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस डील को अमलीजामा पहनाने के लिए प्रभाव और दबाव सहित हर मुमकिन कोशिश की।

खामेनेई ने सोशल मीडिया पर एक संदेश साझा करते हुए दोनों देशों के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर होने की पुष्टि की। उन्होंने साफ किया कि भले ही ईरान ने इसमें भागीदारी की, लेकिन इसे अमलीजामा पहनाने के लिए सबसे ज्यादा छटपटाहट अमेरिका की तरफ से देखी गई।

सर्वोच्च नेता की व्यक्तिगत राय और चेतावनी

सर्वोच्च नेता ने यह भी खुलासा किया कि इस समझौते को लेकर उनके निजी विचार अलग थे। उन्होंने कहा, "सैद्धांतिक रूप से मेरी सोच इस डील के पक्ष में नहीं थी, लेकिन मैंने ईरान के राष्ट्रपति को इस शर्त पर मंजूरी दी कि वे देश के हितों और 'प्रतिरोध मोर्चे' (एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस) के अधिकारों से कोई समझौता नहीं करेंगे।" इसके साथ ही उन्होंने अमेरिका को दोटूक चेतावनी दी कि यदि भविष्य में उसने अपनी सीमाओं से बाहर जाकर अनुचित मांगें रखने की कोशिश की, तो ईरान उसके आगे कतई नहीं झुकेगा। खामेनेई ने देश की जनता से धैर्य रखने और समझौते की शर्तों के लागू होने का इंतजार करने की अपील की है।

शांति समझौते की मुख्य शर्तें

इस समझौते में पश्चिम एशिया में स्थिरता लाने के लिए कई अहम बिंदुओं पर सहमति बनी है:

  • सैन्य गतिविधियों पर रोक: लेबनान सहित सभी मोर्चों पर जारी सैन्य कार्रवाइयों को हमेशा के लिए समाप्त किया जाएगा।

  • समुद्री व्यापार की बहाली: तनाव के दौर से पहले जिस तरह समुद्री जहाजों की आवाजाही होती थी, उसे फिर से उसी स्तर पर बहाल किया जाएगा।

  • नौसैनिक प्रतिबंधों का खात्मा: अमेरिका अगले 30 दिनों के भीतर ईरान पर लगाए गए अपने सभी नौसैनिक प्रतिबंधों को हटा लेगा।

  • सुरक्षित आवाजाही का भरोसा: ईरान ने वादा किया है कि वह अगले 60 दिनों तक वाणिज्यिक (कमर्शियल) जहाजों की सुरक्षित और मुफ्त आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए पूरा सहयोग करेगा।

60 दिनों का समय और अंतिम निर्णय

इस शुरुआती समझौते के बाद अब ईरान और अमेरिका के पास 60 दिनों का समय है। इस अवधि के दौरान दोनों पक्षों के बीच अंतिम समझौते की रूपरेखा और शर्तों पर गहन बातचीत होगी। यदि यह वार्ता सकारात्मक रहती है, तो एक पूर्ण और स्थाई शांति समझौते पर मुहर लग जाएगी। माना जा रहा है कि अगर यह डील पूरी तरह सफल रही, तो पश्चिम एशिया में लंबे समय से चला आ रहा तनाव काफी हद तक शांत हो सकता है।